
श्री चौधरी मंगतू लाल बसवाला जी
मार्गदर्शक टोली
कौमी मुसाफिर बाबा प्रभाती संगठन (रजि.)
परिचय
छाजू लाल जी के पुत्र, ठेकेदार चौधरी मंगतू लाल बसवाला, अपनी वाणी, विचारों और तर्कों की क्षमता से लोगों को आकर्षित करने में सदैव उत्कृष्ट रहे। उनकी स्मरण शक्ति इतनी विलक्षण थी कि समाज आज भी उसका लोहा मानता है। आपको चार सौ से अधिक भजन व वाणियाँ कंठस्थ थीं।
आप दिल्ली के दक्षिणपुरी स्थित दुर्बलनाथ मंदिर और राजस्थान के अलवर जिले में स्थित भर्तृहरि आश्रम की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों में से एक रहे। आपने दक्षिणपुरी दुर्बलनाथ मंदिर में 40 वर्षों तक मुख्य सलाहकार एवं प्रमुख दानदाता की भूमिका निभाई।
सन 1976 में जब सरकारी तंत्र द्वारा मंदिर को तोड़ दिया गया और केवल शिवालय का गुंबद ही शेष रहा, तब चौधरी मंगतू लाल जी ने अपने मित्र तत्कालीन सांसद चौधरी दिलीप सिंह के माध्यम से जगमोहन मल्होत्रा (तत्कालीन उपाध्यक्ष, दिल्ली विकास प्राधिकरण) से संपर्क किया। उनके प्रयासों से मंदिर की भूमि खटीक समाज को आवंटित की गई। आप कुछ समय के लिए भर्तृहरि आश्रम की समिति में अध्यक्ष और मुख्य सलाहकार जैसे पदों पर भी आसीन रहे।
आपके जीवन में तीन प्रेरणास्रोत गुरु रहे:
- संत दुर्बलनाथ जी – धार्मिक आस्था और समाज सेवा की प्रेरणा।
- बाबूलाल खींची (हास्याचार्य) – जिनसे प्रेरणा लेकर युवावस्था में ही आपने शराब और बीड़ी का त्याग कर दिया।
- कौमी मुसाफिर बाबा प्रभाती – जिन्होंने आपको अंधश्रद्धा और बाबागिरी से बाहर निकालकर बाबा साहेब अंबेडकर के शिक्षा आंदोलन से जोड़ा।
बाबा प्रभाती अक्सर सामाजिक आयोजनों में एक पाँव पर खड़े होकर बाबा साहेब अंबेडकर के तीन मूल सिद्धांतों – “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” – का प्रभावशाली प्रवचन देते थे। उन्हीं की प्रेरणा से आपने अपनी बेटियों को शिक्षित करने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप आपकी बड़ी बेटी कमला जी आईडीबीआई बैंक से एमडी पद से सेवानिवृत्त हुईं और दूसरी बेटी राजस्थान सरकार में मुख्य सचिव (कलेक्टर) पद से 2025 में सेवानिवृत्त हुईं। दोनों ने बाबा प्रभाती जी को अपना गुरु माना।
शिक्षा बनाम भंडारा :- एक बार आप और आपकी धर्मपत्नी रुक्मिणी देवी रामदेवरा (जैसलमेर) गए, जहाँ आपने देशी घी का भंडारा करवाया। उस समय बाबा प्रभाती जी ने कहा था:
“यह भंडारा तूने अकेले किया, यदि यही धन किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में लगता तो वह बच्चा कई भंडारे कराने के काबिल बन जाता। अगर समाज यह सोच अपना ले तो कोई भी गरीब बच्चा भंडारों में कतार में खड़ा नहीं मिलेगा।”
यह विचारधारा आपके जीवन के कार्यों में स्पष्ट रूप से झलकती है।