कौमी मुसाफिर बाबा प्रभाती

"शिक्षा और राजनीति ही सफलता की कुंजी हैं, जिनसे हर समस्या का समाधान संभव है"

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कॉमरेड रामभरोसी खितौलिया जी

मार्गदर्शक टोली
कौमी मुसाफिर बाबा प्रभाती संगठन (रजि.)

परिचय

कॉमरेड रामभरोसी खितौलिया का जन्म राजस्थान के हिण्डौन सिटी में हुआ था। उनके पिताजी श्री कुन्दनलाल खितौलिया और माताजी श्रीमती धापा बाई सांवरिया, मूलतः बांसमोरड़ा ग्राम (राजस्थान) से थीं। उनका परिवार प्रारंभिक रूप से भेड़-बकरी पालन और उनकी खरीद-फरोख्त जैसे परंपरागत व्यवसाय से जुड़ा था।


रामभरोसी जी की प्राथमिक शिक्षा हिण्डौन की राजकीय प्राथमिक पाठशाला नं. 2 में हुई। उस समय स्कूलों में जातिगत भेदभाव का बोलबाला था। ब्राह्मण अध्यापक दलित विद्यार्थियों को दूर बैठाते, अपशब्द कहते, और उन्हें छूते तक नहीं थे। शिक्षकों की दो छड़ियाँ होतीं — एक दलितों के लिए, एक सवर्णों के लिए। ऐसे विषम वातावरण में भी रामभरोसी जी साफ-सुथरे कपड़े पहनकर आत्मसम्मान के साथ विद्यालय जाया करते थे। यह व्यवहार उनके भीतर सामाजिक न्याय और आत्मगौरव की भावना को जन्म देने वाला साबित हुआ। माध्यमिक शिक्षा हिण्डौन में पूरी करने के बाद वे 1968 में दिल्ली आए। यहाँ उन्होंने डिफेंस कॉलोनी स्थित राजकीय विद्यालय से सीनियर हायर सेकेंडरी शिक्षा प्राप्त की। प्रारंभ में वे अपने बहनोई श्री सुकराम राजौरा और बहन भगवन्ती के साथ बस्ती बावड़ी झुग्गी में रहे। श्री राजौरा की आई.एन.ए. कॉलोनी में दुकान थी, जहाँ अनेक अधिकारी, विदेशी राजदूत और गणमान्यजन आया करते थे। इस परिवेश ने रामभरोसी जी की सोच को व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया।

दिल्ली में रहते हुए उन्होंने राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट, म्यूजियम, नेशनल स्टेडियम जैसे ऐतिहासिक स्थलों के साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टी के आंदोलनों को भी निकट से देखा और समझा। यहीं उन्हें बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को पढ़ने-समझने का अवसर मिला, जिसकी प्रेरणा उन्हें कौमी मुसाफ़िर बाबा प्रभाती जी से मिली। कौमी मुसाफ़िर बाबा प्रभाती जी, जिन्होंने अंबेडकर जी के मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म को अपनाया था, उनके जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ गए। उन्होंने ही रामभरोसी जी को सामाजिक क्रांति के मिशन से जोड़ने का कार्य किया।

सन् 1973 में रामभरोसी जी ने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और सात वर्षों तक पार्टी में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते रहे। इस दौरान वे ‘कॉमरेड’ के रूप में पहचाने जाने लगे। 1980 में उन्होंने सहकारी समिति में चयन के चलते पार्टी से इस्तीफा दिया और 1993 तक सेवाएँ दीं। इसी वर्ष उन्होंने बाबा प्रभाती के साथ अपने परिवार की सामूहिक फोटोग्राफी करवाई, जो उनके बौद्ध और सामाजिक सरोकारों की स्थायी स्मृति बनी।

1995 में उन्होंने दलित सेना की सदस्यता ली और 1998 में जिलाध्यक्ष नियुक्त हुए। इसी क्रम में वे माननीय श्री रामविलास पासवान के संपर्क में आए। वे 1999 से 2010 तक सवाई माधोपुर कम्युनिकेशन विभाग की सलाहकार समिति के सदस्य रहे। सन् 2003 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा की, लेकिन सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव आज भी बना हुआ है। वे राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सम्मानित समाजसेवक के रूप में पहचाने जाते हैं और विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी करते रहते हैं।